आज़ाद भारत में 71 साल की बुज़ुर्ग सिर पर ढो रही मैला : सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन ने शुरू की मुहिम

”जब हम खपरी से मैला उठाते हैं तो कई बार खपरी टूट जाती है और मैला नाखूनों में घुस जाता है” मैला धोने वाली एक महिला की ये बात सुनकर शरीर में सिरहन पैदा हो रही थी। 

यकीन करना मुश्किल हो रहा था कि आज भी हाथ से मैला उठाने की प्रथा जारी है। ये सब सुनकर ग़ुस्सा नहीं आ रहा था बल्कि इन महिलाओं से आंखें मिलाने की हिम्मत नहीं हो पा रही थी। सिर शर्म से झुका चला जा रहा था। 

इंडिया@80 मुहिम की शुरुआत 

1 सितंबर को दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में हाथ से मैला उठाने और शुष्क शौचालयों की प्रथा को समाप्त करने के लिए सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन की तरफ से इंडिया@80 नाम के एक अभियान की शुरुआत की गई। जिसके तहत एक साल के भीतर देश के इस कुप्रथा को ख़त्म करने का संकल्प लिया गया।   

 

इस कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और जम्मू-कश्मीर से आए सफ़ाई कर्मचारियों ने कहा कि वे पीढ़ियों से इस काम को करते आ रहे हैं लेकिन उनकी आने वाली पीढ़ी को इस काम से बचा लिया जाए। 

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज रहे जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस सुधांशु धूलिया समेत पटना हाई कोर्ट की पूर्व जज जस्टिस अंजना प्रकाश शामिल हुए। उनके अलावा सूचना अधिकार कार्यकर्ता, सिविल सोसाइटी के लोग और आम जनता ने भी शिरकत की।   

”संसद में झूठ कैसे बोला जा सकता है?”

कार्यक्रम के दौरान कभी नाराज़गी से तो कभी रुंधे गले से एसकेए के राष्ट्रीय संयोजक बेज़वाड़ा विल्सन चिल्ला-चिल्ला कर आरोप लगा रहे थे कि” चार राज्यों में आज भी मैला उठाने का काम हो रहा है लेकिन मंत्री संसद में कहते हैं देश में मैनुअल स्कैवेंजिंग का काम नहीं है, संसद में एक मंत्री झूठ कैसे बोल सकता है?” 

‘लोग कहते हैं दूर रहो”

और उनकी इस बात को सच साबित करने के लिए सामने आईं वो महिलाएं जो आज भी इस काम को कर रही हैं, एक महिला ने कहा कि ” आज भी मैं पांच घरों में काम करती हूं, कोई पचास रुपए देता है तो कोई सौ रुपए, मैंने अपनी पूरी ज़िन्दगी बिता दी, मैं अब और ये नहीं कर सकती, शर्म आती है इस काम से।”

वहीं एक और महिला ने कहा कि ”बरसात आती है तो सिर पर रखी टोकरी टपकती है घिन आती है, मैं 40-45 साल से ये काम करती आ रही हूं, लोग छुआछूत मनाते हैं, कहते हैं दूर रहो” ”15 बरस की उम्र से मैला ढो रही हूं।”

हमने बिहार से आई जान ज्योति से बात की वे कहती हैं कि ”जिन्दगी भर मैंने टोकरी ढोई है, तीन सेर अनाज मिलता था, मेरी मां भी यही करती थी, मैं भी यही करने लगी, ससुराल गई तो सास-ननद ने भी यही काम करवाया।” वे बताती है कि 15 बरस की उम्र से उन्होंने इस काम को करना शुरू किया और आज की तारीख़ तक कर रही हैं। 

यहां आई महिलाओं ने बताया कि इस काम को करने की वजह से समाज में उनके साथ भेदभाव किया जाता है, उनके बच्चे स्कूल नहीं जाना चाहते क्योंकि उनके बच्चों को भी वहां भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। ये सब सुनकर ओमप्रकाश वाल्मीकि के उपन्यास ‘जूठन’ की लाइने आंखों के सामने घूमने लगी।   

”71 साल की मूसी देवी अब भी मैला ढोती हैं

उत्तर-प्रदेश के सीतापुर से आई मूसी देवी, जो 71 साल की हैं, ने बताया कि वे अब भी  मैनुअल स्कैवेंजिंगका काम कर रही हैं, वे कहती हैं कि ”मैंने तो अपनी ज़िन्दगी ऐसे ही काट दी लेकिन अब बच्चों का क्या होगा, न नौकरी है, न हमारे पास राशन कार्ड है, क्या खाएं?”

बेज़वाड़ा विल्सन ने आज़ादी के इतने साल बाद भी इस प्रथा के मौजूद रहने को ‘राष्ट्रीय शर्म’ बताया, उन्होंने कहा कि मैनुअल स्कैवेंजिंग के ख़िलाफ उन्होंने 15-16 साल की उम्र से लड़ाई शुरू की थी और आज वो 60 साल के हो चुके हैं, लेकिन आज भी शुष्क शौचालय पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुए। ”हमारे पास सबूत हैं”

वे कहते हैं कि ” देश में आज की तारीख़ में 63 ज़िलों में हाथ से मैला उठाने का काम, शुष्क शौचालय है, अगर सरकार को डाटा चाहिए तो हम दिखाएंगे” वे बताते हैं कि 46 ज़िलों के फोटोग्राफिक सबूत हैं उनके पास। 

बेज़वाड़ा विल्सन कहते हैं कि इन सबूतों को जमा करना उनके लिए आसान नहीं था वे ख़ुद इस कुप्रथा से निकल गए थे लेकिन इसे ख़त्म करने के लिए एक बार फिर उन्हें वहीं जाना पड़ा, वे बताते हैं कि कैसे मैला उठाते और उसे फेंकते वक़्त फोटो ना आने पर दोबारा किसी को कहना कि वही सब दोबारा करो कितना मुश्किल है ये सोचना भी कितना पीड़ा दायक है। 

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में मैला उठाने की प्रथा के साथ ही सीवर और सेप्टिक टैंकों में काम करने वालों की लगातार हो रही मौत और समय पर मुआवज़ा ना मिलने पर भी चिंता ज़ाहिर की गई। 

”सीवर में पति की मौत के बाद 20 साल से लड़ रही पुष्षा

हरियाणा से आई पुष्पा ने लगातार रोते और सुबकते हुए कहा कि ”मेरे पति यहीं दिल्ली में काम करते थे सीवर साफ करना का और सीवर साफ़ करते-करते एक दिन उनकी मौत हो गई और मेरे छोटे-छोटे बच्चे थे और तभी से मैं सरकार से लड़ते आ रही हूं 20 साल हो गए, 2005 में उनकी मुत्यु हुई थी। पति के मरने के बाद एक औरत कैसे छोटे-छोटे बच्चे पालेगी, मैं सरकार से आज तक लड़ती आई हूं, आज तक सरकार ने कुछ नहीं किया।” 

”हर 45 घंटे में सीवर में एक मौत”

वहीं बेज़वाड़ा विल्सन के मुताबिक इस साल के शुरुआती 188 दिनों में ही देश के अलग-अलग हिस्सों में सीवर और सेप्टिक टैंकों में मरने वालों की संख्या 101 को पार कर चुकी है, उनके अनुसार हर 45 घंटे में एक व्यक्ति सीवर में अपनी जान गंवा देता है । 

”सबसे ज़रूरी पुनर्वास”

इन तमाम लोगों की बात सुनने के बाद जस्टिस अंजना प्रकाश ने कहा कि ”इतना कुछ सुनने के बाद मेरी समझ में ये बात आई कि ये समस्या बहुत जटिल है”  वे कहती हैं कि मैला ढोने की प्रथा को क़ानून के ज़रिए ख़त्म भी कर दिया जाए तो बात वहां ख़त्म नहीं होती बल्कि सरकार को उनके लिए बहुत कुछ करना होगा इसमें सबसे ज़रूरी पुनर्वास होगा, समाज के द्वारा उनको स्वीकार करना होगा” 

साथ ही उन्होंने कहा कि मेरे ख़्याल से मैन्युअल स्कैवेंजिंग एक बात है, दूसरी बात है कि हम लोगों को समाज के तौर पर अपना नज़रिया बदलने की ज़रूरत है कि हमारे इन लोगों के भी समान अधिकार हैं। वे आगे कहती हैं कि ”जब हम लोग डिमांड करेंगे कि भेदभाव नहीं होना चाहिए तो सरकार भी प्रो- एक्टिव होगी।  और ये बहुत अच्छा है कि हम लोगों ने कहा है कि ये एक साल के अंदर  ख़त्म हो और उसके बाद एक नई शुरुआत हो”

”समाज को जिम्मेदारी लेनी होगी”

वहीं जस्टिस मदन लोकुर ने कहा कि ”हमारी सरकार, हमारे राज्यों की सरकार, संसद और हमारी ज्यूडिशियरी (न्यायपालिका) कह रही है कि कुछ नहीं हो रहा है, सब ठीक है, तो आप बताइए हम कहां जाएं, ये महिलाएं जिन्होंने आज हमारे सामने बयान दिए हैं वो कहां जाएंगी?” 

”मैं बहुत शर्मसार हूं”

इसके साथ ही उन्होंने कहा कि पूरे समाज को इसके बारे में जिम्मेदारी लेनी होगी कि कुछ किया जाए। जबकि जस्टिस सुधांशु धूलिया ने कहा कि ”कई बार हमें ख़ुशी होती है, दुख होता है, ग़ुस्सा आता है पर ऐसा बहुत कम होता है कि जब आपका सिर शर्म से झुक जाए आज मैं बहुत शर्मसार हूं क्योंकि यहां नारायण अम्मा ने बताया कि वो अपने सिर पर मैला ढोती थीं, मुझे लगता है मैं सिर पर मैला ढो रहा हूं, और हर भारतीय मैला ढो रहा है।” 

नारायण अम्मा का संघर्ष

दरअसल सुधांशु धूलिया जिस नारायण अम्मा की बात कर रहे थे वे आंध्र-प्रदेश के अनंतपुर की रहने वाली हैं। उन्होंने अपने जीवन के क़रीब 36 साल 600 सीट वाले शुष्क शौचालय में काम किया। लेकिन फिर उन्होंने इस प्रथा को त्याग दिया और इसके ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ दी, वे आज सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन की बोर्ड मेंबर हैं और वक़्त-वक़्त पर मैला ढोने के ख़िलाफ़ आंदोलन करती रहती हैं। 

ऐसा नहीं है कि हमारे देश में मैला ढोने को रोकने के लिए क़ानून नहीं है, साल 1993 में मैला ढोने की प्रथा पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है, और इसे साल 2013 में क़ानून बनाकर पूरी तरह से प्रतिबंधित किया जा चुका है। 

लेकिन 1 सितंबर को देश की राजधानी में कुछ राज्यों से आई महिलाओं ने बताया कि आज भी वो इस काम को करने को मजबूर हैं, जिसकी वजह से उन्हें समाज में भेदभाव का सामना भी करना पड़ता है। यहां सवाल उठता है कि जिस प्रथा को कब का ख़त्म हो जाना चाहिए था वो साल 2026 में भी कैसे और क्यों मौजूद है?

(नजमा ख़ान की रिपोर्ट)

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